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यहां हर अर्जुन को एक कृष्ण चाहिए होता है।

अगर तुम अर्जुन बनने को तैयार हो तो मैं तुम्हें बुद्धत्व प्राप्त करने में तुम्हारी पूरी पूरी मदद करूंगा। लेकिन क्या तुम अर्जुन बनने को तैयार हो?

अर्जुन! यानी वह व्यक्ति जो पहले तो अपना मत रखता है और धीरे-धीरे अपने सारे प्रश्न पूछता जाता है और आखिर अंत में आकर अपनी सारी धारणाएं छोड़ देता है। गिरा देता है।

यहां हर अर्जुन को एक कृष्ण चाहिए ही होता है। यहां हर बुद्धत्व प्राप्त करने वाले को एक बुद्ध चाहिए होता है। पूरी गीता में एक ही सिद्धांत मुख्य है। कि जब सामने कोई बुद्ध खड़ा हो तो अपनी किंतु परंतु मत लगाना। छोड़ देना अपनी सारी किंतु परंतु को और अपनी किंतु परंतु लगाने वाले को भी छोड़ देना। हर अर्जुन को युद्ध जीतने के लिए एक बुद्ध की आवश्यकता तो पड़ती है, लेकिन हर किसी को बुद्धत्व उपलब्ध नहीं होता क्योंकि अर्जुन की भांति छोड़ने को शायद ही कोई तैयार हो पाता हो । मेरे पास अनेक लोग आते हैं। प्रश्न करते हैं जिज्ञासा करते है पूछते है कि हे परमात्मा ! क्या हम भी उड़ सकते हैं? क्या हम भी उस अगम-अगोचर को देख सकते? क्या हम भी उस एक अखंड, निराकार, निर्विकार, सार्वभौम ब्रम्ह का साक्षात्कार कर सकते हैं? मैं कहता हूं, हाँ ! सभी कुछ संभव है जिसने स्वयं अखंड, अगोचर, निर्विकार, निराकार, सार्वभौम ब्रह्म का साक्षात्कार किया हो वह तुम्हें भी करा सकता है। लेकिन करना तो सभी चाहते हैं लेकिन उस करने की कीमत शायद ही कोई चुकाना चाहता है। तुम भी शायद वो कीमत नहीं चुकाना चाहो। क्योंकि वह कीमत है तुम स्वयं। तुम्हारी कीमत पर उसका साक्षात्कार होता है। तुम्हें तुमको ही चुकाना पड़ता है जहां ब्रम्ह होता है, विराट होता है, अखंड होता है। उसका तात्पर्य ही इतना है कि वंहा एक ही है। अखंड यानी एक और तुम चाहते हो कि तुम उस एक को भी देख लो और तुम दूसरे भी बचे रहो।   

भूल में हो तुम! उड़ना भी चाहते हो, लेकिन धरती पर अपनी खूँटी भी गाढ़ी रखना चाहते हो। खूंटी ही तो है तुम्हारा हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी, शैव, वैष्णव! कुछ भी नाम रख लो यह खूंटी तुम ही ने तो गाढ़ी है तुम ही ने तो स्वयं को बांधा है इससे।

मैं आज तुम्हें फिर कहता हूं। मैं तुम्हें उस अखंड, अगोचर, निराकार, निर्विकार, सार्वभौम ब्रहम का दर्शन करवा सकता हूँ।  और किसी मूर्खता में मत रहना कि तुम्हें आंखें बंद कर ध्यान करना पड़ेगा, मंत्र जाप करना पड़ेगा, यंत्र, मंत्र, तंत्र, पूजा, अनुष्ठान, तीर्थ, मंदिर, मस्जिद, ब्रह्मचर्य साधना चालीसा कुछ भी करना पड़ेगा। नहीं! मैं तुम्हें ऐसी किसी भी मूर्खता में नहीं डालूंगा क्योंकि इन मूढ़ताओं में तो तुम जन्म से ही हो।  लेकिन कुछ हुआ क्या? अगर हो सकता तो होता तो हो गया होता।

तुम 50 वर्ष के हो गए हो । तुम सोचते हो कि 80 वर्ष वाले को हो जाता होगा । तो 80 वर्ष वाले को भी देख लो। एक भी व्यक्ति संसार में ढूंढे से ना मिलेगा जो यह कहे कि वह उस अखंड, सार्वभौम ब्रम्ह का अनुभव कर चुका है। तुम्हें भी उसका दीदार करा सकता है क्योंकि इस किसी भी उपाय से ऐसा नहीं होगा। तुम्हें कभी भी ख्याल नहीं आया कि आज तक वह घटना क्यों नहीं घटी। कभी नहीं सोचा कि 50 वर्ष हो गए सिर मारते मारते! सिर फूट गया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। हो सकता है, जहां सिर मारे जा रहे हो, वहां दरवाजा ही ना हो। वहां चट्टान ही लगी हो जो कभी टूटे ही ना। तुमने देखा होगा कार के अगले शीशे में कई मक्खियां मरी पड़ी होती हैं। वह किसी तरह कार के भीतर आ जाती हैं और वही भीतर शीशे पर टक्कर मार-मार कर मर जाती हैं। लेकिन थोड़ी सी भी अक्ल नहीं दौड़ाती कि दाएं बाएं दोनों ही तो गेट के शीशे खुले हुए हैं। वहां से बाहर निकल जाएं। बस यही भूल तुम भी किए जा रहे हो। अपने-अपने धर्म स्थलों की चौखटों पर ही टक्कर मारे जा रहे हो। देखते ही नहीं कि दाएं बाएं चारों तरफ वह ब्रह्म बाहें फैलाए खड़ा है। तुम देख ही नहीं रहे हो।

मैं तुम्हें कहता हूं तुम मुझे केवल 1 वर्ष दे दो। 1 वर्ष मेरे कहे चलो। केवल 1 वर्ष मुझे सुनो। आज से ही आरंभ करो मेरे लेक्चर जो जागते रहो 301 से आगे के हैं एक सुबह एक शाम। Jagte Raho Part 301 से लेकर आगे तक। बस और कुछ मत करो और 1 वर्ष तक अपने सारे प्रश्न लिखते रहो जिसका उत्तर आगे आने वाले लेक्चर में तुम्हें स्वयं ही मिल जाएगा। उसे लिखते जाना। धीरे धीरे प्रश्नों के उत्तर मिलते जाएंगे। प्रश्न समाप्त होते जाएंगे। फिर भी अगर कोई प्रश्न बचे तो 1 वर्ष बाद मुझसे पूछ लेना। मैं तुम्हें खाली नहीं जाने दूंगा! खाली छोड़ो मैं तो तुम्हें जाने ही नहीं दूंगा! जाना छोड़ो मैं तो तुम्हें रहने ही नहीं दूंगा!

मैं तुम्हें ऐसा कर दूंगा कि तुम्हारा शरीर खड़ा रहेगा और तुम बीच में से हट जाओगे। वहां शरीर तो रहेगा लेकिन वहां तुम ना रहोगे। तुम्हारी आहुति तो उस अखंड के विराट के यज्ञ में पूर्णता चढ़ चुकी होगी। उस समय तुम स्वयं मिट जाओगे। खो जाओगे और तुम्हारे खोने से पहले तुम्हारे लिए मैं भी खो जाऊंगा। चलो धीरे धीरे समझाता हूं। क्या होगा। सबसे पहले तुम्हारी धारणाएं छूटेगी, संस्कार छूटेंगे, विचार छूटेंगे, तुम्हारे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी नामक धर्म रुपी भ्रम भी छूटेंगे। तुम्हारे मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारे, सभी छूटेंगे। तुम्हारे भूत के विचार गिरेंगे और भविष्य की कल्पना भी छूटेंगी और इसी प्रकार एक दिन लेक्चर सुनते सुनते मैं भी छूट जाऊंगा  और अंत में एक दिन तुम भी स्वयं से छूट जाओगे। बस वही तुम्हारा आखिरी कदम होगा। मैंने पहले भी तुम्हें कई बार समझाया है कि धर्म का मार्ग वंहा से आरंभ होता है जहां तुम खड़े होते हो और वहां पर समाप्त होता है जहां तुम नहीं होते हो। तो जैसे ही तुम्हारा अंतिम कदम उठता है वो वंही पड़ता है जहां विराट होता है, जहां ब्रम्ह की वेदी जल रही होती है और उसी वेदी में जब तुम्हारा अंतिम कदम पड़ता है तो तुम वंही स्वाहा हो जाते हो और वहां वही सार्वभौम अखंड बचता है। इसी का नाम एलाइनमेंट है। इसी का नाम बुद्धत्व है। इसी का नाम परमात्मा है।

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