His Dream The imagination of a World that is free from superstitious.

His Dream The imagination of a World that is free from superstitious.

Feel free to look around

His Dream The imagination of a World that is free from superstitious.

His Dream The imagination of a World that is free from superstitious.

किसी भी मंदिर मस्जिद में तुम्हे परमात्मा नहीं मिलेगा।

“धर्म प्राप्ति के उपाए”

आज संसार मे जितने उपद्रव तुम धर्म कि नाम पर कर रहे हो उतने शायद ही किसी और नाम पर तुम कर पाते। हिन्दू मंदिर बनाने के नाम पर उपद्रव करता है और मुस्लिम इस्लाम की रक्षा क़े नाम पर। मिशनरी तुम्हे क्रिशचन बनाने को उतारू है तो कोई और सम्प्रदाय अपना मत सब पर लादना चाहता है।  यह सब क्यों क्योकि तुमने धर्म को जाना ही नहीं। तुम हिन्दू , मुस्लिम, सिख, ईसाई को ही धर्म समझने लग गये।

“धर्म”

मै तुम्हें एक सिद्धांत समझाता हू कि तुम धर्म कि नाम पर जिसको पाने कि कोशिश करते हो उसे तो पैदाइश तुम अपने साथ लेकर ही आये हो, उसे छोड़ने का उपाए तुम्हारे पास है ही नहीं, तुम चाह कर भी उसे छोड़ नहीं पाओगे। एक सिद्धांत तुम हमेशा कि लिए समझ लो अगर परमात्मा है अगर खुदा है तो वो हर जगह है कण कण मै है तो उसको कहा खोजोगे और अगर वो नहीं है तो कही नहीं है तो उसे कहा खोजोगे। और अगर वो हर जगह है कण कण मै है जर्रे जर्रे मै है तो उसका मंदिर बनाओगे कहाँ? उसकी मस्जिद बनाओगे कहाँ? जब वो कण कण मै है तो जहाँ तुमने श्रद्धा से सर झुका दिया वहीं उसका मंदिर और वहीं उसकी मस्जिद। केवल तुम्हें अहंकार छोड़कर अपनी मै छोड़कर सर झुकना बाकि है और दूसरी बात तुम यह समझ लो चाहे तुम किसी भी धर्म को मानते हो यह बात सभी पर लागू होती है की अध्यात्म का मतलब, धर्म का मतलब स्वयम को बनाने का नहीं है धर्म या आध्यात्म का मतलब श्री, श्री श्री, 108 , 1008 , महामंडलेश्वर, संत, गुरु, सदगुरू, बनने का नाम नहीं है । धर्म या आध्यात्म तो स्वयम की मैं स्वयम का अहंकार गिराने का नाम है। तुम सोचते हो मिटटी कि दीपक का नाम धर्म है कोई कहता है सोने कि दीपक का हो जाना धर्म है। नहीं मै कहता हू दीपक के बुझ जाने के नाम धार्मिक हो जाना है। तुम उपाए कर करके करते क्या हो? तुम उपाए करके स्वयं की मैं को बलवान करते हो, स्वयम के अहंकार को ओर परिपक्व करते हो। तुम एक उदहारण देखो।

मानो तुम एक लहर हो और लहर उपाए कर रही है स्वयम को पक्का करने को स्वयम को लहर बनाये रखने को। सोचो लहर को लहर बने रहने से क्या लाभ, लहर अगर अपनी मै छोड़ दे अपना अहम् छोड़ दे तो लहर सागर ही तो है। अब सागर को सागर होने के लिए क्या कोई उपाए करने है। नहीं –  सागर तो सागर ही है। उसी प्रकार अगर तुम भी मैं को मिटा दो तो तुम हो ही नहीं वहां एक ही परमात्मा है, एक ही खुदा है, वो भिन्न भिन्न रूप लेकर आता है, और भिन्न भिन्न लीला कर चला जाता है तुम कौन हो बीच मै अपनी मै को जोड़ने वाले। अंत मै इतना ही आंख खोलो जागो देखो कि तुम कर क्या रहे हो, यहा केवल जागना भर है यहा कोई उपाए है ही नहीं यहाँ। इसलिए मैं कहता हूँ अभी भी समय है जागो! आंख खोलो देखो तुम कहा भागे जा रहे हो! देखो धर्म के नाम पर तुम क्या क्या पाखण्ड कर रहे हो।

ध्यान करो! जागो! जागते रहो!

परमात्मा