His Dream The imagination of a World that is free from superstitious.

एक परम ज्ञान की अवस्था !

न मंत्र न दीक्षा ! केवल बोध !

धर्म की सर्वोच्च अवस्था !

एक जीवित धर्म !

तुम्हे कही भी पहुंचना नहीं है।

हम सब दौड़ रहे हैं परंतु क्यों? नहीं पता। और लौटता भी कौन है? और इस दौड़ का केवल रूपए की दौड़ से ही मत मान कर संतोष मत कर लेना। कि तुम तो बच गए क्योकि तुम रुपये की दौड़ में शामिल नहीं हो। लेकिन तुम रूपये की दौड़ में न सही अन्य दौड़ में तो शामिल हो।

तुम्हारी जो स्वर्ग की दौड़ है, बैकुंठ की दौड़ है, सिद्धाश्रम की दौड़ है, गोलोक की दौड़ है वो सारी की सारी ही चाह की ही दौड़ है। उसमे कुछ भी अंतर नहीं है।

मै तुम्हे हमेशा यही समझाता हू कि तुम 2 क्षण शांति से बैठो ध्यान करो तो तुम पाओगे की तुम्हे कही भी पहुंचना नहीं है।

मेरे ध्यान का मतलब केवल खाली होकर बैठना है विश्राम करना मात्र है। ध्यान का मतलब जो आज तक तुमने सुन रखा है की तुम्हे आंखे बंद कर भृकुटि के मध्यें ध्यान केंद्रित करना है यह भी तुम्हारे पंडित पुरोहित की ही चाल है। पहले जप, तप, व्रत से स्वर्ग, बैकुंठ, सिद्धाश्रम, गोलोक आदि के स्वपन दिखाए अब तुम वहा न फसे तो ध्यान मे ही फसाने की ठान ली।

तुम देखो क्या तुमने अपनी दौड़ समाप्त कर दी है या अभी दौड़े चले जा रहे हो। 

ध्यान रखना ये दौड़ कभी भी समाप्त नहीं होती है।

तुम आज भी दौड़ रहे हो बिना ये समझे कि सूरज समय पर लौट जाता है।

अभिमन्यु भी लौटना नहीं जानता था हम सब अभिमन्यु ही हैं हम भी लौटना नहीं जानते।

सच ये है कि “जो लौटना जानते हैं, वही जीना भी जानते हैं पर लौटना इतना भी आसान नहीं होता।”

काश इस  कहानी का वो पात्र समय से लौट पाता! काश हम सब लौट पाते!

इसलिए मैं कहता हूँ अभी भी समय है जागो! आंख खोलो देखो तुम कहा भागे जा रहे हो! देखो धर्म के नाम पर तुम क्या क्या पाखण्ड कर रहे हो।