Shri Guru Pramatmana was born in Delhi on October 1967. He belonged to a lower middle class family and did his schooling from government school called Tent Wala School. He was known as Vipin in school. After completing his high school, he did a diploma course in Television and Audio Video. In 1984 he got his first job in Delhi and his salary was Rs 140/- per month. Since this salary was not enough for survival, he did a part time job along with his regular job to earn some extra penny. Along with his job, he enrolled himself in DU for some correspondence course. After clearing his 2nd year, unfortunately he had to discontinue with his education.

In 1989, Pramatmana started his own business, he established a manufacturing unit of Colour T.V. In 1997, he even involved in the manufacturing unit of Photo Framing. In the year of 2000, Parmatmana left his parent’s house along with his Wife, daughter and a two and a half year old son. He did not take a single penny from his parents, neither did he ask for any share from his parental property. He came to Delhi NCR and borrowed 40,000/- rupees from his friend and took a loan of 5 lac rupees from bank. With this money he bought a flat at Delhi NCR worth rupees 5.40 lac.

Shri Guru Parmatmana was a dedicated man, and he followed the proverb “Where there is a will, there is a way”. Keeping this philosophy in mind intact he started everything from ground once again. With zero cash in hand, he started a new business of providing human resource for cleaning services. He took AMC from shops, farmhouse, kothi etc. He worked hard for his clients and soon settled his business. He made a good reputation and earned a huge amount of money, with this money he bought a land in Vrindavan and built his first Spiritual Asharam on that land. This ashram was ready by 2008.  Simultaneously he bought one more huge land in Allahabad along the bank of Ganges for social cause.

Parmatmana had also registered two NGO in the named

“Vedvyas Foundation”


“Woman Organization for Rural Livelihood and Development”.

In this spiritual journey from 1990 to today, Parmatmana gained a lot of devotional knowledge. He even wrote 8-10 holy books. During this holy journey he met lot of Saints and spiritual people from Vrindavan, Hare Krishna movement and even Rishikesh Gyan Marg. Parmatmana also read some Books from Geeta Press, Akahndanand, Kinker, Ram Chandra Dogrey, Tilak, Shanker, Ramanuj, Vivekanand, Buddha etc. helped Parmatmana understand the spirituality well and gain knowledge.

On one fine day of the year 2015, Parmatmana met a man (dineshanand disciple of Narayan Dutt Shrimali) randomly who called himself to be a Saint. Few days later Parmatmana realized that, that random man has hypnotized him and ruined his life and his family as well. Parmatmana came to know that, that random man is no saint; instead he is a Tantric, Aghoori, or Vam Margi Sadhak who has some negative energy. The Tantric and his daughter Himmani, his co partner Puneet jain and Birender tiwari and some other guys in his team are well known about this Tantra Vidhya and they use this Tantra Vidya for making money. The Tantric Dineshanand learned this Tantra Vidhya from his pathetic mood guru name was Narayan Dutt Shrimali who used the same tantrik Vidhya for making money. Tantric and his daughter took a complete advantage of their hypnotism and took enough money from Parmatmana and not only that Parmatmana spend huge money on tantrik’s daughter Himmani for her marriage with his own pocket. Not only this, the aghoori Tantric and his daughter even hypnotized some young boy’s teams, those young boys have usually come in the tantrik house.

In 2018, somehow Parmatmana managed to come out of hypnotism, but sadly realized that the young boy’s team has been badly trapped in their hypnotism and is now willing to learn Tantra Vidhya, Samshan Kriya and KalaJadu etc. The Tantric & his Pandas some names are puneet jain, tiwari and sharmas have threatened these younger guys in the fear of hell because of which these guys refused to leave them. Parmatmana tried his best to rescue these guys from their trap but all was in vain and are hypnotized by tantric and his daughter Himmani because these guys was totally in their control.
This incident was a turning point of his life; from that day onwards Parmatmana decided that he would provide the real spiritual knowledge and Budhatva Marg, to the innocent people. Soon he learned that the Mandir Pujari, Dharam Guru, Tantric Yog Guru, Sadhus and Sanyasis have misguided the innocent people just for the sake of money.

In between 1989 to 2015, Parmatmana had an extremely successful business where he earned huge amount of money and lead a lavishing life. During those times he owned BMW & Mercedes and many other luxurious cars, wore diamond rings and exquisite jewelry, expensive watches, not only this he even owned a huge flat in Delhi NCR. During his lavish life he always thought of Moksh and Mukti, he even believed in god deeply. Ever since Parmatmana was hypnotized by that tantric, he decided to devote his rest of the life to the positive side of the spiritual World; he started giving lecture on spiritual knowledge so that he can spread the real Dharam Gyan and true meaning of Moksh, Mukti and God. He completely shifted from a lavish life to real spiritual life. His mission was not to teach any religion, but to create awareness in every human’s mind regarding the true spiritual knowledge.
Please follow the following YouTube channel for all his lectures.
His Dream The imagination of a World that is free from superstitious. “PARMATMANA”

परमात्मनः जो एक छोटे से परिवार में जन्मा जिसकी शिक्षा रुपयों के अभाव में बार बार रुकी , जिसको शायद रात को खाना मिले या न मिले यह भी भरोसा नहीं था, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे , अच्छी ज़िंदगी जीना , सुख जो किताबों में होते हैं , स्वर्ग के सपने जो तुम्हारे शास्त्रों में वर्णित हैं उन्हें यही इसी धरा पर पाना।
लेकिन मंज़िल अभी केवल दिमाग़ में थी , चित्रों में थी , राह सामने थी लेकिन कदमों में। छोटी छोटी गति थी कदमो में।
खैर परमात्मनः चले अकेले , बिना किसी के सहारे , अकेले अपने लक्ष्य की ओर , जो शायद कभी किसी ने सोचा भी न होगा वो काम पकड़ा। अपने हाथ में।
फिर पूरी दिल्ली में अपनी छाप छोड़ी करोड़ों रुपये कमाए नए व्यवसाय से , यह तो थी सांसारिक ज़िंदगी। लेकिन रुपयों से ही अगर भूख मिट सकती तो सरे धनवान सबसे सुखी होते , तृप्त होते। लेकिन धनवान ही सबसे ज्यादा अतृप्त दिखते हैं। दुखी , उदिग्न , अशांत दिखते हैं।
यह अशांति प्यास अतृप्तता भी थी परमात्मनः के भीतर। फिर एक नई खोज प्रारंभ हुई , स्वयं की खोज , जिसने परमात्मनः को जगह जगह भटकाया। कभी किसी मंदिर तो कभी किसी तीरथ , चूँकि परमात्मनः हिन्दू परिवार में ही पैदा हुए थे तो ज़ाहिर है खोज हिन्दू मंदिरों में , हिन्दू तीर्थो में और हिन्दू शास्त्रों से ही करनी थी। तो परमात्मनः ने अनेको शास्त्रों का अध्ययन किया। जप किया अनेको वर्ष रोज के 12 – 12 घंटे , व्रत रखा है लगातार पांच वर्ष , रात – रात भर बैठकर कपकपाती हुई ठंड में , हरिद्वार में जनवरी के दिनों में सर छोटी , गले में कंठी , जनेऊ , माला झोली मस्तक तिलक। सभी का प्रयोग किया। उस भगवान को खोजने में जिसके चित्र तो सभी मंदिरों में टंगे हैं जिसका वर्णन तो सभी शास्त्रों में है लेकिन जिसका साक्षात्कार किसी को भी नहीं हुआ है। इसी खोज के दौरान परमात्मनः 15 – 18 वर्ष बृंदावन की 1 चिर परिचित कृष्ण भक्ति संस्था से भी जुड़े रह।
वहाँ के मुख्य संन्यासी गोपाला कृष्णा से जब 1995 – 96 के दौरान जिज्ञासा की , कि परमात्मा का साक्षात्कार कैसे संभव है तो वो कहता था कि कलियुग में ईश्वर का साक्षात्कार केवल पत्थर की मूर्ति के रूप में ही संभव है। परमात्मनः उसके उत्तर से संतुष्ट तो नहीं हुए। लेकिन इतना ज्ञात हो गया कि ये लोग केवल अपना केवल अपना व्यापार ही चला रहे हैं लेकिन परमात्मनः जुड़े ही रहे उसी संस्था से कि शायद कोई और तो होगा, मुखिया ना सही कोई छोटा साधु – सन्यासी जिसे उस परम का दीदार हुआ होगा। सैकड़ों महात्मा मिले लेकिन सभी 1 ही तरह के पोंगा पंडित ही थे।
किसी ने कहा माला को 2 घंटे से बढ़ाकर दस घंटे कर दो , किसी ने कहा एकादशी से काम नहीं चलेगा पांच वर्ष उपवास करो। किसी ने गोवर्धन परिक्रमा को कहा , किसी ने पूरी पूरी रात हरिद्वार में कपकपाती ठंड में जप को कहा। खैर सभी कुछ किया लेकिन अंत में स्वयं को पाया वहीं का वहीं । बल्कि और उलझा हुआ। खोज जारी रही। प्यास गहरी होती गई।
अचानक 2015 के लगभग परमात्मा को एक अघोरी मिला , शमशान का साधक बताने लगा स्वयं को , वो शायद सम्मोहन विद्या जानता था किसी जोधपुर के गुरु का शिष्य स्वयं को बताता था। उसने कहा कि तुम्हें अगर परम की खोज करनी है तो श्मशान की साधना करनी होगी। जिसने जीवन के क्षेत्र में अपना व्यापर 1 नए मार्ग से स्वयं के बनाए हुए मार्ग से शुरू करने का जोखिम उठाया हो वो भला कहाँ डरे ?
परमात्मनः चले उसी के साथ , उसी के पथ पर , श्मशान की साधनाओं का मार्ग देखा लेकिन बाद में समझ आया कि वो बेचारा ग़रीब आदमी चाहता था कि परमात्मनः भी उसी की तरह 1 – 2 भूत प्रेत सिद्ध कर ले और लोगो को सम्मोहित कर स्वयं को सद्गुरु, सिद्ध, या श्रेष्ठ कहलवाने का दावा करें। जैसा वो या उसका गुरु आज तक करते आये है।
जैसा आज के समय में कोई भागेश्वर धाम के नाम से या करोली सरकार के नाम से ठग लोग कर रहे हैं , वो लोगों को भूत प्रेत के नाम से डरा रहे हैं , ग्रसित बताकर उनके उपचार का ढोंग कर रहे हैं तथा रुपया लूटने का धंधा चला रहे है। इन में हिंदू , मुस्लिम , ईसाई या अन्य सभी धर्मों के लोग शामिल है।
लेकिन परमात्मनः जानते थे कि स्वयं की खोज सिद्ध होने पर नहीं , सम्मोहन विद्या सिखने पर नहीं , स्वयं के पैर पुजवाने पर नहीं , मैं की समाप्ति पर मैं के मरने पर , अहंकार के तिरोहित होने पर ही संभव है।
खैर 3 – 4 वर्षा यहाँ भी ख़राब करने पर परमात्मनः , लाखो रुपये उस अघोरी पर बर्बाद करने के बाद परमात्मनः वहाँ से भी आगे बढ़े। लेकिन अब कुछ बदल गया था भीतर। खोज ही शायद पूर्णता में तब्दील हो चुकी थी। इतने वर्ष भटक भटककर परमात्मनः के मन में यह बात बैठ चुकी थी 30 – 35 वर्ष ख़राब हो गए मूर्तियों में चित्रित परमात्मा , भगवान , ईश्वर शायद हो ही नहीं या हो तो काल्पनिक हो , मनगढ़ंत हो।
अब परमात्मनः की दौड़ का रुख़ समाप्त हो चुका था , श्मशान की सिद्धियों की चाह , चरण पुजवाने की चाह , जो अक्सर लोग कर लेते हैं जिसके पीछे उनकी मंशा होती है की किस तरह लोगो को मुर्ख बना कर उनका रूपया ऐठा जाये , वो तो परमात्मनः में कभी भी थी ही नहीं। क्योकि परमात्मनः अपना एक अच्छा ख़ासा व्यापार कर रहे थे ,लग्ज़री कारों में पहले से ही घूमते थे ,तो धन की भी चाह नहीं थी , श्मशान की साधनाओं की दौड़ भी ख़त्म हो गयी , अब सारी राहें जो दूर ले जाती थी वह स्वयं की ओर आ गई , स्वयम ही मिटा दी गई। अब परमात्मनः अकेले खड़े थे। स्वयं के पास कोई भी मार्ग नहीं था चारों ओर, ख़ाली केवल ख़ाली।
परमात्मनः रोज शाम को आराम करने , विश्राम करने बैठे रहते थे पार्कों में , वृक्षो के पास। जहाँ वो देखते कबूतर दाना चुग रहे हैं , गिलहरी दाना खा रही है , कौवे गीत गए रहे है , फूल पत्ते कांटे वृक्ष घास पात सभी निर्त्य कर रहे है। अचानक परमात्मा को भी सम्फुरणा हुई कि यह सब परमात्मा के दिए हुए जीवन से इतना ख़ुश हैं तो मैं क्यों दुखी ?
इतना सोचने मात्र से ही परमात्मनः के भीतर एक कंपन हुआ तो मानो सृष्टि ही बदल गई , जो कोवा अभी तक जीवन के 52 वर्षो तक शोर मचाता नज़र आता था वो कोवा आज वेदवाणी गाता दिख रहा था , जो सूखे पत्ते आज तक पार्को में गंदगी फैलते दिखते थे आज वो सूखे पत्ते हवा के चलने मात्र से नाचते हुए दिखने लगें।
परमात्मनः क्या बदले सृष्टि ही बदल गई। पूरा का पूरा रूपांतरण हो गया मैं के मिटते ही तू का आविर्भाव हो गया। जीवन जो अब तक बोझ था जो विचार अब तक दूषित थे हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार , दुखालयम , अशवतवम , सुखालयम , शाश्वतं , अहम ब्रह्मास्मि में तब्दील हो चुके थे।
अब जिसे ज्ञात हो गया की मैं ही ब्रम्ह हूँ वो कही यह थोड़े ही सोच सकता है कि बाकि पापी है कि बाकि दुष्ट है ? नहीं यहाँ सभी तो ब्रम्ह है पूरे पूरे ब्रम्ह। तो मैं तुम हिंदू मुसलमान सिख ईसाई बौद्ध जैन कुत्ता गाय कोवा बिल्ली हम सभी मिलकर ही तो पूर्ण परमात्मा बने , फिर कौन छोटा कौन बढ़ा ? सभी एक ही तो है एकात्मकता सध गई। चारो और वही जीवन नाचता गाता दिखाई दिया , साक्षी भाव का , दृष्टा भाव का उदय भीतर से ही हो गया ।
अब न कोई हिन्दू बचा , न मुसलमान , न सिख न ईसाई ही। अब तो जीवन बचा , परमात्मा बचा , ब्रम्ह बचा।
परमात्मनः ने अपने हिंदू होने के धार्मिक चिन्ह मिटा दिए क्योंकि ईश्वर कहीं हिन्दू होता है ? ख़ुदा कही मुसलमान होता है ? वो तो बस होता है। हम सभी उसी के तो स्वरुप है। दौड़ समाप्त हुई कंही पहुंच कर नहीं , स्वयं पर आकर।
दूर कही नहीं जाना , स्वयं पर आना है। आज तक हम सभी उसे खोजने दूर दूर भटकते रहे , कभी स्वयं को , भटकने वाले को नहीं देखा। कभी सोचा ही नहीं कि जो भटक रहा है ,जो खोजना चाहता है वही तो खोजा जाने वाला है।
अब परमात्मा ने देखा कि चारों तरफ लोगों ने धर्मों के नाम पर ना जाने क्या . क्या पाखण्ड फैला रखा है तो परमात्मनः ने सोचा कि संसार से यह पाखंड की दुकानों को हटाया जाए। भारत जैसे देश में जहाँ धर्म पर बात करने से ,पाखंड पर बात करने से , सभी कतराते हैं क्योंकि यहाँ हर वो व्यक्ति जो किसी न किसी धर्म की दुकान से पेट पालता है वो केस करने की धमकी दे देता है। फिर भी किसी की भी परवाह न करते हुए परमात्मनः ने पाखंड की दुकानों से लोगों को सावधान करने का बीड़ा उठाया। परमात्मनः ने लोगों को अपने लेक्चर्स के माध्यम से समझाया कि तुम सभी मुक्त ही हो। जो बंधन तुमने समझे है वो तुम्हारे ही सभी के बांधे हुए है। तुम्हे कोई भी बंधन नहीं है।
और पर्मात्मा खुदा ईश्वर सत्य नाम है तुम सभी के जीवन का। खुदा , ईश्वर , परमात्मा किसी व्यक्ति का नाम नहीं है और न ही यह कहीं दूर किसी गृह पर बैठा व्यक्ति नहीं है। वो जो धारणा है कि 33 करोड़ देवी देवताओ की, वो किसी ज़माने में किसी बुद्ध ने अपनी आँखों से देखे होंगे तब उस समय कही विश्व की जनसंख्या भी 33 करोड़ रही होगी इसलिए उस बुद्ध ने कह दिया 33 करोड़ देवी देवता है लेकिन आज दुनिया में 33, करोड़ देवी देवता नहीं है आज हम सभी 770 करोड़ देवी देवता है। हमें सभी का सम्मान करना है हम सभी तो देवी देवता है हम सभी तो ईश्वर है सभी का सम्मान सभी से प्रेम करना ही वास्तविक धर्म है। हम सभी मिलकर ही वो विराट बने। अगर हम सभी खंड .खंड हो जाये तो पर्मात्मा की खुदा की धारणा भी छिन्न भिन्न हो जाएगी।
परमात्मनःने समझाया कि अगर किसी युद्ध में हम सभी मारे जाएं तो बताओ कि ईश्वर खुदा कहीं जीवित बचेगा ? नहीं ! हमारे मरते ही खुदा भी मिट जाएगा ईश्वर भी समाप्त हो जाएगा क्योंकि हम सभी मिलकर ही तो वो बने।
वो जो धारणा है कि परमात्मा का , खुदा का जन्म नहीं होता सत्य ही तो है। जीवन !. जीवन का जन्म होता है क्या ? नहीं !. जीवन तो अनादि काल से ही है वो जो धारणा है कि परमात्मा , ख़ुदा का अंत कभी नहीं होता। तो जीवन का अंत कभी होता है ? नहीं !. मेरे जाने के बाद , तुम्हारे जाने के बाद भी जीवन बचेगा। हमारे बच्चो में। हम सभी के मिटने के बाद भी जीवन बचेगा पशु पक्षियों में , चाँद तारो में।
जीवन कभी भी समाप्त नहीं होता परमात्मा ,खुदा ,जीवन कभी नहीं मरता। ईश्वर ,जीवन ,परमात्मा ,खुदा नाम है इस जीवन धारा का।
जो बह रही है हम सभी के भीतर।
लेकिन गलती हम से क्या हुई कि हम उन लोगों के कहने पर आ गए जो कभी भिखमंगे थे जिन्होंने अपना पेट भरने हेतु धर्म की दुकानें खोल दी और बन बैठे हम सभी के अग्रगण। हाँ उनको दुकानें ही कहना ठीक होगा क्योंकि बनायी दुकानदारों ने। कृष्ण ने नहीं बनायी ,बुद्ध . महावीर ने नहीं बनायी , मोहम्मद ,जीसस ,नानक ,कबीर ने नहीं बनायी। यह महापुरुष तो आये अपने ही जीवन में सत्य को पाया स्वयं के ब्रम्ह होने को पहचाना और जीवन को स्वर्ग में रहकर जिया और जीवन को ही स्वर्ग बनाकर चले गए।
लेकिन दुकानें बनायी इन सभी के बाद आए मैनेजरों ने क्योंकि उन्होंने न तो सत्य को समझा , ना पाया। शायद उनकी मंशा सत्य को समझने और पाने की थी ही नहीं। क्योंकि तुम्हारी तो पंक्ति यह ‘‘भूखे पेट न भजन होये ‘‘
वो बेचारे कामचोर भिखारी ही रहे होंगे और समाज में आज हो क्या रहा है ? कोई राम कृष्ण की दुकान चला रहा है , कोई अल्लाह की , कोई भूत प्रेत वाला बाबा बने बैठा है। कोई सिद्ध कोई सद्गुरु नाम रखें अपनी दुकाने खोले बैठा है।
कोई यह नहीं समझा रहा है कि तुम ही पूर्ण परमेश्वर हो जिसे तुम खोज रहे हो।
जीवन का अर्थ केवल इतना ही है कि तुम सभी मिल जुलकर हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई ,बौद्ध ,जैन को भूलकर प्रेम मोहोब्बत से इस जीवन को जी लो। क्योंकि अगर यह पाठ लोगों की समझ में आ गया तो मंदिर ,मस्जिद की लड़ाई ही समाप्त हो जाएगी। फिर राजनेता और धर्म नेता अपनी अपनी रोटियां कहाँ से सेकेंगे।
परमात्मनः की मुख्य शिक्षाओं में से मुख्य है कि अगर दुनिया में से मंदिर ,मस्जिद ,गिरजे ,गुरुद्वारे ,बौद्ध विहार, जैन मंदिर यह जितने भी धर्म स्थल है वो मिट जाए और जितने भी धर्म ग्रंथ है वो मिट जाये तो दुनिया यक़ीनन सुन्दर हो जाएगी। लोग प्रेम पूर्वक रहने लगेंगे।
दूसरी की अगर इस दुनिया में से सभी देशो की सीमाओ का अंत हो जाये तो पूरी दुनिया को जो 40 – 50 % का रक्षा व्यय हर देश अपनी रक्षा पर व्यय करता है वो धन लोगों की सेवा में लगेगा। जिससे यही संसार स्वर्ग बन जायेगा। और ऐसा संभव है जब हर देश के आईएएस, आईपीएस जैसे पढ़े लिखे व्यक्ति मिल जाए तो दुनिया को एक परिवार बनाकर चलाया जा सकता है।
और तीसरा कि अगर संसार में से शादी जैसी संस्था समाप्त हो जाए तो जो आज स्त्रियों का शोषण होता है 99 प्रतिशत वो सदा सदा के लिए समाप्त हो जाएगा क्योंकि फिर यह अधिकार स्त्री के हाथ में हो जाएगा कि उसे इस व्यक्ति के साथ रहना है या किसके साथ अपना जीवन गुजारना है।
मंजिल दूर है कठिन है और भारत जैसे पिछड़ी सोच रखने वाले लोगो के लिए तो बहुत कठिन है। अगर आज नीव पड़ी है तो एक न एक दिन महल भी खड़ा होगा। लोग आएंगे और एक .एक ईंट जोड़ते जाएंगें आख़िर एक दिन महल बनेगा ही। और तब तक हमारे देश की बाग डोर किसी धूर्त अनपढ़ राजनेता के हाथ में न होकर अगर कुछ पढ़े लिखे आईएएस , आईपीएस , डॉक्टर इंजीनियर , एडवोकेट , जज जो रिटायर्ड होने के लगभग हों वो सभी मिलकर एक नई पार्टी बनाये और इस देश को चलाने का ज़िम्मा अपने कंधों पर ले लें तो यही दुनिया हमारा भारत ही स्वर्ग बन जायेगा।
जिस स्वर्ग की कल्पना हमने पुस्तकों में की है जिस जन्नत के चित्र हमने बेकार की पुस्तकों में पड़े हैं वो यही हक़ीक़त हो जाएगी। दुनिया में प्रेम होगा भाई चारा होगा। पूरा भारत ग़रीबी के दलदल से निकल कर संपन्न होगा। चारो और खुशहाली होगी , लोग इसी संसार में नाचेंगे गाएंगे जैसे आज तक यहाँ बुद्ध पुरुष नाचते आये है।
और अंत में अगर सत्य का साक्षात्कार करना है तो राम , कृष्ण अल्लाह गोड गुरू नहीं स्वयं को जानो। मैं को खोजने से ही खोज पूर्ण होती है और मै के मिटने पर ही तू का आविर्भाव होता है और जिस दिन कोई मनुष्य स्वयं के दर्श कर लेता है उस दिन वो जान पाता है कि यहाँ सभी तो ईश्वर है। फिर उसकी कोई भी दौड़ नहीं बचती। फिर असल में आनंद बरसता है क्योंकि अब न कहीं जाना है न कुछ पाना है , न मुक्ति , न मोक्ष न स्वर्ग न बैकुंठ , इस विचार का नाम कि मैं स्वयं में परिपूर्ण हूँ बुद्धत्व है ,निर्वाण है ,मुक्ति है ,मोक्ष है , परमपद है , सत्य है ,परमहंस अवस्था है ,विदये होना है।
बाकि सिद्ध होना , सद्गुरु होना , महामंडलेश्वर होना , पीठाधीश्वर होना , पंडित होना , मौलवी होना , फाथर होना , सभी अहंकार के भिन्न भिन्न नाम है। स्वयं को धोखा देने के नाम है और कुछ भी नहीं।

Parmatmana: One who was born in a small family whose education was stopped in between from time to time due to lack of money. He was not even confirmed he may get food at night or not, but his dreams were very big. To live a good life. Happiness which is mentioned in books. To get the dreams of heaven which are mentioned in your scriptures in this current life.

But the destination was still in the mind. the path was there in front but there was a little hesitation in stepping forward. Rest Parmatmana: Walked alone without any support, towards his goal, which probably no one would have imagined. There is turning point in life where he earned crore of rupees from his new business for which he had to travel whole Delhi and NCR This was his worldly life.

But if the hunger could have been quenched by money, then all the rich would have been the happiest. They would have been satisfied. But the rich seem to be unsatisfied. They seems to be unhappy and worried.

The same unrest, thirst and insatiability was there in Parmatmana. Then a new search began (the discovery of self) which led Parmatmana to travel to temples and sometime to pilgrim.

Since Parmatmana was born in a Hindu family, then obviously the search had to be done in Hindu temples, in Hindu pilgrimages and from Hindu scriptures. That’s why Parmatmana studied many scriptures. Chanted for several years 12 hours a day. Fasted for five consecutive years. Sitting overnight in the freezing cold In Haridwar. in those times Parmatmana used to wear janaeu, wears kanthi around his neck and had applied with tilak on his forehead to find the truth.

In search of that God, whose pictures are hanging in all the temples, whose description is mentioned all the scriptures, but no one has been interviewed. During this search, Parmatmana was also associated with one of the familiar Krishna Bhakti organization of Vrindavan for 15-18 years.

When Parmatmana had met the chief of same organization Gopala Krishna, he inquired about how it is possible to have a realization of God during 1955-96, he used to say that in Kaliyuga, the realization of God is possible only in the form of a stone idol. Parmatmana: was not satisfied with his answer.

But as like other organization these people were running his own business, but Parmatmana remains attached to the same institution that perhaps someone else will help a small monk who would have seen that Supreme. Hundreds of Mahatmas were found but all were helpless and ponga pandit.

Some says, increase the chanting from 2 hours to ten hours, some says that Ekadashi will not work, do fasting for five years, some says to Govardhan Parikrama and some says to chant in the cold winter in Haridwar all night. Well, tried with everything but at the end found myself the same place. Rather complicated. The search continued. The thirst deepened.

Suddenly, in 2015, the Parmatmana found an Aghori, he says he is the seeker of the crematorium started. He said that if you want to search for the Supreme, then you have to do the sadhana of the cremation ground. As Parmatmana has already took the risk of starting his own business in the field of life why he should be afraid of other things?

Parmatmana: walked with him on the same path and did the cremation rituals but later he understood that the poor aghori man wanted that Parmatmana should also prove 1-2 ghosts like him and hypnotize the people like he himself does. Claim himself to be called Sadh guru or superior. As he and his guru’s sons has been doing till date.

As in today’s time some people are cheating in the name of Bhageshwar Dham or in the name of Karoli Sarkar, they are intimidating people in the name of ghosts, they are pretending people to be sick to earn money after cheating them.

These include Hindus, Muslims, Christians or people of all other religions.
But Parmatmana knew that the discovery of the self is only be possible only after the self-discovery, not by learning the science of hypnotism, not by worshiping one’s own feet, only by the disappearance of the ego.

Well, after spoiling 3-4 years here also, Parmatmana: even spent lacs of rupees on that Aghori, Parmatmana: proceeded further from there without looking back. But now something had changed inside. The discovery itself may have turned into perfection. After wandering for so many years, this thing had settled in the mind of Parmatmana: 30-35 years got spoiled. The God depicted in the idols may not the actual or it may be imaginary.

As the race of Parmatmana was finally over for finding the God as like others Parmatmana doesn’t wanted people worship him. As Parmatmana was doing a good business and well settled. Already used to roam in luxury cars, so there was no desire for money. He was self-sufficient man.

Parmatmana: Sitting every evening in the park near the trees where he used to see pigeons are eating the grain, the squirrel is eating the grain, the crows are singing, the flowers, the leaves, the thorns, the trees, the grass, all are dancing. Suddenly, Parmatmana realized if these things are happy in life which is given by God why am I sad?

Just by thinking of this, there was a tremor within Parmatmana, as if the world itself had changed. in last 52 years, the pigeon which seems to be making noise now he realizes he is basically singing, today, dry leaves started dancing with the mere movement of the wind.

When Parmatmana has realized that he has change, it seems the universe has changed? The whole thing has changed whole transformation is done. The life which was a burden till now, the thoughts which were so far contaminated according to Hindu scriptures had been transformed.

Now the one who has come to know that I am Brahma only, he can’t hardly think that others are sinners or others are wicked \ No, here everyone is Brahman and the whole Brahman. So, I, you, Hindu, Muslim, Sikh, Christian, Buddhist, Jain, dog, Cow, Cat.  We all together have become the Supreme God. Then who grew smaller. The same life was seen dancing and singing all around.

Now there is neither a Hindu, nor a Muslim, nor a Sikh nor a Christian. as everyone is self-enlightened.

Parmatmana has removed all the religious signs of his being a Hindu because God is not Hindu or Muslim or Sikh or Christian and is present everywhere. The race of searching God is ended by reaching on self.

For searching the God, you don’t have to roam, you have to approach yourself. Till today we all wandered far and wide searching for him and never saw our-self as a wanderer. Never thought that the one who is wandering, the one who wants to be discovered is the one to be discovered.

As Parmatmana saw that people have spread hypocrisy all around in the name of religions, then Parmatmana thought that these shops of hypocrisy should be removed from the world.

In a country like India, where talking about religion is hypocrisy and where people hesitates because Everyone here every person who feeds himself from the shop of some religion, those people threaten to do the case. Still, not caring about anyone, Parmatmana took the initiative to warn people from the shops of hypocrisy. Parmatmana explained to the people through his lectures that you all are liberated. The bond that you have understood is all bounded by you as there is no bond.

As God is the true name of everyone’s life. God is not the name of any person, nor it is a person sitting somewhere far away. The belief of 33 crore demi gods and goddesses. There must be a time where any enlightenment person had seen with his own eyes that the population of the world must have been near 33 crores, so the Buddha told that 33 crores are gods and goddesses are there. But in today’s time there is no 33 crore deities in the world, today we all are 770 crore deities. We have to respect everyone, we all are deities, we all are Gods, respecting all and loving everyone is the real religion. If we all get fragmented, then the concept of God will also be shattered.

Parmatmana: explained that if all of us were killed in a war, then will God survive somewhere, no! God will also disappear as soon as we will die, God will also die.

The belief that God will not born is true. Does life is born, no isn’t! – Life is therefore, immemorial, the belief of God never ends So life never ends, no! – once I’m gone there will be a life even after you are not there, in our children. Even after the death of all of us, life will remain in the animals, in the stars, in the moon etc.

Life never ends, life never dies. God is the name of this stream of life which is flowing within all of us.

But what was wrong with us that we came at the behest of those people who were once beggars who opened religious shops to fill their stomachs and we became the followers for all those behest people. Yes, it would be correct to say them shops because the shopkeepers made them. Krishna did not create, Buddha and Mahavir did not create. Muhammad, Jesus, Nanak, Kabir didn’t create it. These Great Man came and found the truth in his own life, recognized himself as Brahman, lived life as heaven and left life as heaven.

As the shops were made by managers came after these enlightened persons because those managers not found and understood the truth. Perhaps those people intention was not to understand and get the truth. Because you normally say, hungry stomach shouldn’t be worshiped.

Those poor must have been beggars and what is happening in the society today, somebody is running the shop of Ram Krishna, some of Allah, someone is sitting as a black magic Baba. Some are keeping the name of a Sadguru, is sitting and running his shops.

No one is understanding that you are the perfect God whom you are seeking.

The actual meaning of life is living together forget about Hindu, Muslim, Sikh, Christian, Buddhist, Jain and live this life with love. Once if this lesson is understood by all the people, then the battle for the temple-mosque will end. Then from where will the politicians and religious leaders bake their chapattis?

As one of the main teachings of Parmatmana is that if temples, mosques, churches, gurudwaras, Buddhist temples, Jain temples, all these religious places, and all the religious texts, disappear, then the world will surely become beautiful. People will start living with love.

Secondly, if the borders of all the countries of this worlds end, then the expenditure of 40-50% which was spend on defense of the entire world that money will be spend on the service of the people. By which this world will become heaven. And this could be possible when educated persons like IAS-IPS from every country are found, then the world can be run as one family.

And third that if the institution like marriage is abolished from the world, then 99 percent of the women which are exploited today will end forever because then the rights will be in the hands of ironing whether she has to get married with this person or with whom she wants to spend her life?

And till then, if the ruling of our country shouldn’t be in the hands of any illiterate politician, rather if some educated IAS, IPS, Doctor Engineer, Advocate, Judge, who are about to retire, they should together form a new party and have the power to run this country. If these educated person takes responsibility on their shoulders, then this world, our India, will become heaven.

The heaven which we have imagined in books, the pictures of heaven which we have seen in useless books will become the reality. There will be love in the world. The whole of India will come out of the quagmire of poverty and prosper. There will be prosperity all around.

And at the end, if you want to know the truth, then know yourself, not Rama, Krishna, Allah, Jesus. The search will be completed only after the discovery of ourself, and only after the disappearance of ourself, you appear and on that day a man sees himself, he comes to know that all available here is God. Then everyone here is human, not Hindu, Muslim, Sikh and Christian.

Then in reality there is bliss, because now you don’t have to go anywhere, there is nothing to be attained, there is no liberation, there is no salvation, no heaven, no Baikuntha. The idea of being that I am perfect in myself and is self-enlightenment, there is nirvana, there is liberation, there is salvation.

To be a perfect, to be a master, to be a mahamandaleshwar, to be a peethadhishvar, to be a pandit, to be a cleric, to be a father all egos have different names. It is in the name of deceiving oneself and nothing else.