Independence Day: ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’, इस ‘मैं’ से तुम बाहर निकलो

You are currently viewing Independence Day: ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’, इस ‘मैं’ से तुम बाहर निकलो
JHANDA UNCHA RAHE HAMARA

15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस (Independence Day)आने वाला है. इस दिन लोग यही गाते नजर आएंगे…झंडा ऊंचा रहे हमारा…इस बार तो देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देश के लोगों से अपील की है कि आप अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल की डीपी जो है वो तिरंगे वाली यानी देश के झंडे वाली लगाना. इस बीच परमात्मा इस झंडे को लेकर क्या राय दे रहें हैं आपको जानना जरूरी है.

परमात्मा कहते हैं कि तुम अपनी मैं को बढ़ाने के लिए क्या-क्या उपाय करते हो. भिन्न-भिन्न उपाय…तुम चाहते हो कि तुम्हारे नाम के झंडे लोग उठा लें…सुना है ना तुमने…झंडा ऊंचा रहे हमारा…ये केवल तुम्हारे देश की कहानी ही नहीं है. हर देश के लोग अपने-अपने झंडे के बारे में ऐसा कहते हैं. देश तो छोड़ो…तुम अपने-अपने घर के लिए भी…अपने ‘मैं ‘ के लिए भी यही सुर अपनाते हो…झंडा ऊंचा रहे हमारा. तुम चाहते हो कि दुनिया तुम्हारे नाम के झंडे उठा लें. तुम दृष्टा हो तुम साक्षी हो…लेकिन तुमने किया क्या…तुम दृष्टा और साक्षी के ऊपर चिड़ियां बनकर बैठ गये. और जब हाथी गया पुल के ऊपर…पुल हिला और तुमने कहा कि मैंने पुल को हिला दिया. बस हो गयी तुम्हारी ‘मैं’ चालू…

‘मैं’ से तुम निकलो बाहर (Independence Day)

तुम्हारे अहंकार को तृप्ति मिलती है. जब तुम बोलते हो मैंने ये काम किया. तुम सोचते हो जो काम कर रहा हूं ‘मैं’ कर रहा हूं. बस यही तो तुम्हारा अहंकार है. काम स्वंय हो रहे हैं. तुम काम नहीं करोगे तब भी ये काम होंगे. मैं तुम्हारे सांसारिक काम कर बात नहीं कर रहा हूं. मैं तुम्हारे ध्येय से जुड़े काम की बात कर रहा हूं. स्वंय हो रहे हैं. जहां तक सांसारिक कार्य की बात है, वो तो तुम्हें करने ही पड़ेंगे. मैं उसके त्याग की बात ही नहीं कर रहा हूं. केवल तुम अपनी ‘मैं’ का त्याग कर दो. जैसे ही तुम अपनी ‘मैं’ का त्याग कर दोगे…तुम्हारा अहंकार स्वंय गलित हो जाएगा. फिर अष्टावक्र की बात तुम्हें सही-सही समझ में आ जाएगी. कि तुम दृष्टा हो और तुम साक्षी हो.

हाथी कभी नहीं बोलता कि हमने पुल को हिला दिया

तुम बोलते हो कि हमने पुल को हिला दिया. हाथी कभी थोड़े ना बोलता है कि हमने पुल को हिला दिया. इसी तरह तुम अपनी ‘मैं’ की बात करते हो कि मैंने ये कार्य किया लेकिन तुम्हारे अंदर बैठा हुआ परमात्मा…तुम्हारा साक्षी…तुम्हारा दृष्टा (Independence Day) मौन रहता है. वह तुम्हारे बढ़े हुए अहंकार को कभी हिलाने नहीं देता है. वह तो मौन…चुपचाप तुम्हारी सेवा में तत्पर रहता है. तुम देखो एक बच्चा पैदा होता है तो क्या उसे पता होता है कि सांस लेनी है और लेनी है तो कैसे लेनी है. नहीं ना…लेकिन उस बच्चे के अंदर बैठा परमात्मा…वह सांस लेता है उस बच्चे के लिए…ताकि बच्चा जीवित रहे. अब तो मानों ना कि परमात्मा तुम्हारे स्वंय के भीतर है. उसको कहां ढूंढ़ोगे…उसे तो तुम्हें पहचानना है.

तुम बेवजह अकड़े-अकड़े रहते हो (Independence Day)

जैसे ही तुमने एक बार अपने ‘मैं’ को अलग कर दिया. तो तुम स्वंय परमात्मा हो. तुम बेवजह अकड़े-अकड़े रहते हो. तुम खाना खाते हो…परमात्मा तुम्हारे खाने को पचाता है. रात का खाना खाकर तुम तो सो जाते हो लेकिन परमात्मा अपना काम करता रहता है. तुम सो जाते हो…परमात्मा तुम्हारे भीतर बैठकर तुम्हारे लिए सांस लेता है. तुम देखो परमात्मा तुम्हारे लिए स्वंय काम करता है. लेकिन फिर भी वह तुम्हारे अहंकार में बाधा नहीं डालता है. क्यों…क्योंकि परमात्मा तो शांत है. मौन है.

नितांत मौन…गहन मौन…इसी चीज के लिए मैं तुम्हें कहता हूं कि तुम ध्यान करो…जब तुम मौन होगे ना…शांत होगे. विश्राम होगे. तो फिर मौन से मौन का साक्षात्कार आसानी से हो जाएगा. तुम ठीक-ठीक देख पाओगे कि सबकुछ अपने आप हो रहा है. बच्चा पैदा हो रहा है. बड़ा हो रहा है. जवान हो रहा है. बूढ़ा हो रहा है. मर रहा है.

प्रक‍ृति की ओर एक नजर डालो

प्रक‍ृति को देखो. एक बीच जमीन के अंदर जाता है. पौधा बनता है. वृक्ष बनता है. बड़े-बड़े वृक्ष हो जाते हैं. फल लगता है. फिर बीज बनता है. फिर वृक्ष बन जाते हैं. पानी पहाड़ों से निकतला है. नदियों के रास्ते समुद्र में जाता है. फिर भांप बनता है. फिर बारिश होती है. फिर इसी तरह घूमता रहता है. ये सारे कार्य प्रकृति के अपने आप चल रहे हैं. केवल तुम अपनी हूं ‘मैं’ को बीच में डाल देते हो. और फिर ‘मैं’ से मुक्त (Independence Day)होने के उपाय खोजते रहते हो. अष्टावक्र समझाते हैं कि तुम्हें मुक्त होना ही नहीं है. तुम स्वंय मुक्त हो. तुम केवल अपने आप को पहचान लो.

भाग्य में होने का मतलब है तुम्हारा अकर्ता भाव होना

तुमने शास्त्रों में पढ़ा है ना…किताबों में…तुम्हें सब समझाते हैं कि सभी कुछ भाग्य से हो रहा है. यहां भाग्य का भी तुमने गलत मतलब निकाल लिया. भाग्य का मतलब है कि जीवन में सब तो घटित होना ही होना है. और हो ही रहा है. वह तुम्हारे भाग्यवश ही हो रहा है. लेकिन तुमने भाग्य को केवल पैसों से जोड़ दिया. केवल रुपये पैसों से…और फिर तुम उसी रुपये पैसों में उलझ गये. भाग्य का मतलब है कि तुम बढ़ रहे हो.

तुम्हारे जीवन में जो-जो घटित हो रहा है. वह स्वंय हो रहा है. तुम छोटे थे. बड़े हुए. बूढ़े हुए. जो-जो तुम्हारे कार्य होने हैं वो हो रहे हैं. ये भाग्य है. लेकिन तुम केवल रुपये से मतलब ले लेते हो. यहां भी तुमने गलत मतलब ले लिया. तुम भाग्य के सहारे रुपया पैसा को भी छोड़कर हाथ पे हाथ धरकर बैठ गये. ये भाग्य तो नहीं हुआ ना. भाग्य में होने का मतलब है तुम्हारा अकर्ता भाव होना था. तुम अकर्ता भाव तो नहीं हुए…अकर्मण्य हो गये.

तुम ध्यान करो

भाग्य का मतलब है कि मैं कुछ करता हूं…ऐसा भाव का निकल जाना था. ऐसा भाव तो ना निकला. तुम हाथ पर हाथ धरे बैठ गये कि जो जो भाग्य में होगा…(Independence Day)भाग्य का मतलब यह नहीं है. जो भी तुम्हारे शास्त्रों की युक्ति है ना…तुम सही-सही अपनी बुद्धि में उतारो. और सही-सही कैसे उतरेगी. जब तुम ध्यान करोगे. भीतर जाओगे. तो इन सभी प्रश्नों के उत्तर तुम्हें स्वंय से मिलेंगे. इन प्रश्नों के उत्तर बाहर से नहीं मिलने वाले हैं. इसलिए मैं तुमसे कहता हूं. तुम ध्यान करो. भीतर जाओ.

आज इतना ही…शेष किसी और दिन…चारों ओर फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…