Raksha Bandhan 2022 : रक्षाबंधन का शुभ मुर्हूत क्या है ? परमात्मा ने बतायी इसकी सच्चाई

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Raksha Bandhan 2022

Raksha Bandhan 2022 date : एक ने पूछा कहता है परमात्मा रक्षाबंधन के लिए कौन सा समय उचित है ? कौन सा मुर्हूत…किस समय रक्षा बंधन बांधा जाए. मुर्हूत देखे बगैर तुम्हारा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ता है. मनुष्य बिना मुर्हूत (rakshabandhan kab hai) के पैदा होता है और बिना मुर्हूत के मर जाता है. वह पूरा जीवन मुर्हूत के पीछे भगता रहता है. तुम्हारी बात कर रहा हूं मैं…तुम जो पूछ रहे हो. हर धर्म में कोई ना कोई रूढीवादी अंधविश्वासी क्रियाएं होती ही हैं. खाली हिंदू की बात नहीं कर रहा हूं कि रक्षाबंधन तुम्हारा है. हिंदू क्या मुसलमान में भी, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन…सभी में शुभ मुर्हूत…

जो सोए-सोए कर लो वो अशुभ (Raksha Bandhan 2022)

तुम पैदा हुए इसका कोई मुर्हूत था. तुम जो कर लो. सही तरीके से कर लो. दिमाग की खिड़कियां खुली करके रख लो. बोधवान होकर कर लो. प्रज्ञावान होकर कर लो. वह शुभ है. और जो सोए-सोए कर लो वो अशुभ है. उस अशुभ को करने में मुर्हूत देख भी लोगे तो क्या है. लेकिन तुम्हें चलाने वाले जो तुम सबके धर्म गुरू हैं. वो अगर तुम्हारे मन में भ्रम ना डालें कि ये शुभ है… ये अशुभ है.

तो उन बेचारे भिखमंगों की रोटी कहां से चलेगी. वो तुमसे दो-दो रुपये लेते हैं ना…थाली में तुम ही तो डालते हो. मंदिरों में चढ़ावा…मस्जिदों में चढ़ावा…गिरजे-गुरूद्वारों में चढ़ावा…हर धर्म संस्था का बिना चढ़ावे के तो गुजारा होता नहीं है. और उसी चढ़ावे की खातिर तुम्हें लालच दिया जाता है कि स्वर्ग में अपसराएं मिलेंगी. तुम्हारे भोग के लिए…तुम्हारे…एक-एक आदमी के बिस्तर पर चार-चार अप्सराएं होंगी. मुसलमान भी ये लालच देता है कि 72 हूरें मिलेंगी. इसलिए हिंदू मुसलमान को मार देता है कि हूरें मिलेंगी और मुसलमान हिंदू को मार देता है कि अप्सराएं मिलेंगी. ईश्वर प्रसन्न होगा.

जीवन को जीने से ही मनुष्य को धर्म की प्राप्ति होती है

शुभ मुर्हूत की आवश्यकता नहीं थी. शुभ बोध की आवश्यकता थी. शुभ बुद्धि की आवश्यकता थी. तुम्हारे बुद्धि के द्वार खुले होने की आवश्यकता थी. प्रज्ञावान होने की आवश्यकता थी. जीवन धर्मों के नामों से नहीं चलता है. ना तो तुम कुछ समझ पाओगे. जीवन जीकर समझा जा सकता है और उसी जीवन को जीने से ही मनुष्य को धर्म की प्राप्ति होती है. अर्जुन को धर्म की प्राप्ति युद्ध लड़कर हुई. गीता सुनकर नहीं हुई थी. गीता सुनकर तो केवल इतना बोध हुआ था कि तुझे भागना नहीं है. तुझे जागना है. युद्ध करना है. मैं भी तो तुम्हें वहीं कह रहा हूं…भागो मत जागो…अर्जुन क्या गीता सुनकर संसार से भागा था. नहीं संसार में वापस गया था. युद्ध लड़कर…

तुमने कैसे-कैसे सिद्धांत बना लिये

बुद्ध को बुधत्व प्राप्त हुआ. तो क्या संसार से भागे…नहीं जंगल से वापस संसार में आ गये. महावीर वापस आये. नानक ने संसार में रहकर परमात्मा को पाया. लेकिन तुम…तुम गीता पढ़ते हो. आश्रम बनाएंगे. आश्रम में जाकर रहेंगे. कोई पढ़े लिखे बच्चों को…डॉक्टर…इंजिनियर को बहला फुसलाकर आश्रम का संन्यासी बना लेता है. अब इतना बड़ा आश्रम बनाया है तो उसकी देखभाल के लिए नौकर-चाकर चाहिए ना…और पढ़ा लिखा नौकर-चाकर तो सभी को चाहिए. और तुम भी बन जाते हो. तुम्हें भी लगता है कि इस मंदिर, मस्जिद, गिरजे , गुरुद्वारे की सेवा करेंगे तो ईश्वर प्रसन्न होगा.

तुम सभी के ईश्वर ऐसे ही प्रसन्न होते हैं. चाहे हिंदू का राम-कृष्ण हो या मुसलमान का अल्लाह…ईसाई का गॉड…बौद्ध धर्म का बुद्ध…कमी ईश्वर की नहीं निकाल रहा हूं मैं…कमी तुम्हारी निकाल रहा हूं मैं कि तुमने ऐसे-ऐसे कृत्य बना लिये. तुमने ऐसे-ऐसे सिद्धांत बना लिये. जिसका ईश्वर से कोई लेना-देना नहीं है. तुमने माना हुआ है कि मुसलमान को मारने से राम प्रसन्न होता है. तुमने माना है कि हिंदू को मारने से अल्लाह प्रसन्न होता है.

तुम ठीक हो जाओ तो सारे मुर्हूत ठीक (Raksha Bandhan 2022)

शुभ मुर्हूत की आवश्यकता नहीं थी. शुभ बुद्धि की आवश्यकता थी. तुम ठीक हो जाओ तो सारे मुर्हूत (Raksha Bandhan 2022) ठीक…मैनें तुम्हें पहले भी कई बार समझाया है ना..पुण्य करने नहीं होते….जिस दिन तुम ठीक हो जाते हो….उस दिन तुम जो करते हो पुण्य हो जाता है. अगर तुम्हारी बुद्धि के द्वार खुल जाए. तो तुम ये थोड़े ही देखोगे कि एक पक्षी मर रहा है. एक पशु मर रहा है. मुझे उसको बचाना है. वो सामने कुत्ता आये तो भी तुम बचाओगे. गाय तो भी तुम बचाओगे. कौवा बैठा होगा तो भी तुम उसे दाना डालोगे और कोयल बैठी होगी तो भी तुम उसे दाना डालोगे. लेकिन अभी तो तुम सारे काम उस बंधन के घेरे में बंधकर कर रहे हो.

तुम्हें बहुत अच्छे तरीके से इस देह में जीना आ जाए

हिंदू है तो गाय कि पूजा करेंगे. गाय को रोटी खिलाएंगे. कुत्ता आ गया तो मारकर भगा देंगे. तुम्हारे ही धर्म ग्रंथों में लिखा हुआ है ना जिस घर में कुत्ता होता है उस घर का खाना देवी-देवता ग्रहण नहीं करते. तुम्हारे ही शास्त्रों में वर्णन है ये…थोड़ा बोध से काम लो…दिमाग से ऊपर उठो. धर्म केवल इतना है कि तुम्हें बहुत अच्छे तरीके से इस देह में जीना आ जाए और दूसरे को भी जीने दे. और परमात्मा की धारणा साफ सुनो तो हो सकता है कि तुम्हारे में से किसी की भावना आहत हो जाए…तो हो जाए.

हवा की तो भवनाएं हैं. ईश्वर नाम का व्यक्ति…कहीं किसी दुनिया में…ईश्वर, खुदा, अल्लाह, गॉड किसी दुनिया में नहीं बैठा है. और तुम्हारी धारणा भी यही है. ईश्वर कण-कण में है. जब वो कण-कण में है तो बैठा कहां है. खुदा जर्रे-जर्रे को महका रहा है. जर्रे-जर्रे में खुदा निवास करता है तो जब वो जर्रे-जर्रे में है तो बैठा कहां है. तुम…हम…सब उसी के रूप हैं. हम सब मिलकर परमात्मा बनते हैं. हम सब मिलकर वहीं परमात्मा बनें…वही खुदा बनें. तुम्हारी धारणा है ना…हजारों करोड़ों हाथ हैं परमात्मा के…तो किसके…हम सबके…हिंदू के भी… मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन के भी…

धर्म के नाम पर इतनी हिंसा

शुभ मुहूर्त का इंतजार नहीं करना है. बुद्धि को शुद्ध करना है. अपने बोध को जगाओ. अपनी प्रज्ञा को जगाओ. फिर वो परमात्मा…वो खुदा..जर्रे-जर्रे में हैं. फिर वो हिंदू का परमात्मा मस्जिद में भी विराजमान है और फिर वो मुसलमान का खुदा हिंदू की गंगा में भी बह रहा है. हिंदू के मंदिर में वही तो आरती स्वीकार कर रहा है. लेकिन तुम्हें मूढ़ों ने किसी और ही रास्ते में लगा दिया है. आज पूरा देश लगा हुआ है. हिंदू-मुसलमान-सिख-ईसाई…कहां जाकर गिरोगे तुम. सोच के देखो तुम अपने बच्चों को किस संसार में छोड़ना चाहते हो.

अपने मरने के बाद….मरोगे ना…आखिर 80 वर्ष या 90 वर्ष में…किस संसार में तुम्हारे बच्चे सुरक्षित हैं. सभी के बच्चे…हिंदू के,मुसलमान के,सिख के,ईसाई के…जहां धर्म के नाम पर सब एक-दूसरे से लड़ें..मारें..काटें…या ऐसे संसार में छोड़ना चाहते हो जहां कोई धर्म ना हो…सभी एक दूसरे के साथ प्रेम से रहें. कैसी दुनिया चाहते हो तुम अपने बच्चों के लिए…इन मूढ़ताओं से आखिर बाहर तो निकलना ही पड़ेगा तुम्हें…आज तुम नहीं निकलोगे तो हजार वर्ष बाद तुम्हारे बच्चे निकलेंगे और वो हंसेंगे तुमलोगों पर कि कैसे पूर्वज थे हमारे…वो जो डार्बिन का सिद्धांत है ना…कि बंदर से आदमी बना. फिर वो खूब हंसेंगे कि बंदर रहे होंगे तो ऐसे ही रहे होंगे. ऐसे ही लड़-मरे होंगे. धर्म के नाम पर इतनी हिंसा…जब धर्म के नाम पर इतनी हिंसा है तो अर्धम के नाम पर तुम क्या-क्या नहीं करोगे सोचो जरा…

आज इतना ही…शेष किसी और दिन…चारों ओर फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…