Ponga Pandit :पोंगा पंडित मत बनो

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Ponga Pandit

जीवन लाखों लोगों में से एक को प्राप्त होता है. ये कोई आसमान से नहीं टपकता बल्कि धक्के खाकर मिलता है. जैसे मुझे मिला है. मुझे ये 52 वर्ष की अवस्था में मिला. पहले मैं भी तुम्हारी तरह भटकता था. यानी पोंगा पंडित (Ponga Pandit) था. मैं टीका लगाता था. चोटी रखता था. किसी कृष्ण भक्ति संस्था से जुड़ा था और परिक्रमा, तीर्थ, गंगा स्नान सभी करता था. एक ही लक्ष्य था उस वक्त…बैकुंठ जाने का….जीवन तो चला जा रहा था.

तंत्र-मंत्र की चपेट में आया (Ponga Pandit)

अचानक मेरे जीवन में एक व्यक्ति मिला. उसका नाम दिनेशानंद था और वो तांत्रिक था. किसी मूढ़ निखिलेशानंद का शिष्य था वो. उसके साथ तंत्र-मंत्र में पांच साल कैसे बीत गये पता नहीं चला. अंत में किसी ने मुझे समझाया कि ये तुमसे पैसे लूटने आया है और कुछ नहीं. जिसने मुझे ये बताया वो उसका शिष्य रह चुका था. उसने कहा कि वो तुम्हारी मति फेर देगा. किसी तरह मैं वहां से निकला और उसके चार-पांच महीने के बाद मैंने सोचा कि हम कर क्या रहे थे. केवल उस मूढ़ की बातों में आकर अपना वक्त और पैसा नष्ट कर रहे थे.

आखिर जीवन का लक्ष्य क्या है

सुबह इसकी आरती शाम को उसकी आरती…पीतरों को पूजना…मूर्ति की पूजा…आखिर जीवन का लक्ष्य क्या था. यहीं सब ? अगर ऐसे ही जीवन जीना होता है तो जीवन मिला क्यों ? जीवन का लक्ष्य बहुत मुश्किल से मिलता है. जब वहां से निकले तो समझे की जीना है. उसके बाद मैंने वीडियो तैयार करना शुरू किया. सभी चीजों को जो धारण किये हुए था मैंने बाद में फेंक दिया. इसके बाद मेरा जीवन शुरू हुआ. पहले मैं पोंगा पंडित बने फिर रहा था. मैंने जीतनी मूर्खता की है शायद ही तुमने धक्के खाये हों. लेकिन जीवन के लक्ष्य के लिए धक्के खाने होते हैं.

ईश्वर तेरा धन्यवाद…मजा आ गया (Ponga Pandit)

जब बच्चा चलना शुरू करता है तो वो कई बाद गिरता है. अंत में वो खड़ा होकर अच्छे से चलने लगता है. तुम भी ऐसे ही सीख जाओगे. दिल्ली में तिहाड़ जेल है. वहां से कई लोग रोज निकलते होंगे. क्या उन्हें ये महसूस होता है कि जेल के बाहर कितनी मुक्ति है. तुम सोच में पड़ जाओगे. कैसी मुक्ति और कैसा आनंद…रोज तो जाते हैं. लेकिन जो व्यक्ति सालों जेल में रहकर आया हो. वो बाहर आकर कहता है कि ईश्वर तेरा धन्यवाद…मजा आ गया. अंदर वहीं नीला आकाश…बाहर भी वही…एक गेट का तो अंतर था. अंदर बिना कमाये खाना मिल रहा था. बाहर तो कमाना होगा. अंदर बीमार होगे तो डॉक्टर आएगा. बाहर तुम्हें डॉक्टर के पास जाना होगा. लेकिन फर्क क्या है ? मुक्ति…इसी मुक्ति का अहसास मैं तुम्हें बताने आया हूं.

जीवन को जीना मात्र लक्ष्य

जिसने बंधन देखा. वहीं मुक्ति को समझ सकता है तुम मुक्त हो लेकिन तुम्हें अनुभव नहीं हो रहा है. मुझे अनुभव हुआ क्योंकि मैं गिरा बार-बार…इस जीवन को जीना लक्ष्य है. जीवन को जीना मात्र लक्ष्य है. इसमें करना कुछ नहीं है. तुम मंदिर, मस्जिद ,गिरजे ,गुरुद्वारे ,बौद्घ स्थल में जाकर अपना समय व्यर्थ गंवा रहे हो. जिस दिन तुम्हें अपना जीवन नजर आयेगा. उस दिन तुम्हें सामने वाले का भी जीवन नजर आने लगेगा. उस दिन तुम्हें सभी प्यारे लगेंगे. क्योंकि सभी तो जीवन जी रहे हैं.

जीवन का लक्ष्य ठोकर खाकर मिलता है

अभी तुम जीवन नहीं जी रहे हो. हिंदू को स्वर्ग जाना है तो मुस्लिमों को 72 हूरों से मिलना है. अभी जो तुम्हारे दिमाग में है, उसे निकालना होगा, तभी तुम जीवन जी पाओगे. जीवन का लक्ष्य ठोकर खाकर मिलता है. खूब ठोकरें खाओ. गिरो…आखिर एक दिन खड़े हो ही जाओगे. आखिर मैं भी तो हुआ. मेरी अभी की तस्वीर देखो और पंद्रह साल पहले की. दोनों में तुम्हें अंतर नजर आएगा.पहले मैं टेंशन में रहता था साफ नजर आएगा. अब मैं आनंदित हूं. पशु-पक्षियों को देखो वो कितने आनंद से हैं. ना उन्हें स्वर्ग जाना है और ना ही बैकुंठ…वे नाच रहे हैं. खेल रहे हैं.

सारे कृत्य के बाद भी तुम दुखी हो

और तुम्हें स्वर्ग जाना है. वैकुंठ जाना है. जन्नत जाना है. पक्का जाना है और तुम उसके लिए उपाय भी कर रहे हो. हिंदू पूजा कर रहा है तो मुसलमान नमाज पढ़ रहा है. सारे कृत्य तुम कर रहे हो लेकिन फिर भी दुखी हो. हम कर क्या रहे हैं. क्या इसका नाम जीवन है. क्या इसके लिए देह पाया…कोई हिंदू की तो कोई मुसलमान की भेड़..कोई सिख तो कोई ईसाई की भेड़…जीवन जीना था. ये लक्ष्य है. बस और कहीं नहीं जाना…कुछ भी नहीं करना.

आज केवल इतना ही…शेष किसी और दिन…अंत में चारों तरफ बिखरे फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…