धार्मिक और आध्यात्मिक में क्या अंतर हैं

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धार्मिक और आध्यात्मिक aaj ka bhagwan

एक ने पूछा कि क्या धार्मिक होना या अध्यात्मिक (धार्मिक और आध्यात्मिक) होना आवश्यक है. हम क्यों हिंदू हों या क्यों मुसलमान, क्यों सिख, क्यों ईसाई जैन या बौद्ध…मैं वर्तमान समय में हिंदू ,मुसलमान, सिख, ईसाई जैन या बौद्ध कुछ भी नहीं हूं. जिसे तुम धार्मिक होना बोलते हो दरअसल वो है ही नहीं. हम उनका स्वागत करते हैं जो हमारे धर्म को नहीं मानते हैं और हम उनका भी स्वागत करते हैं जो किसी भी धर्म को नहीं मानते हैं. आधी से ज्यादा दुनिया ऐसी है जो इन मूढ़ताओं में नहीं है.

जो मैं हूं…वही परमात्मा है (धार्मिक और आध्यात्मिक)

ये हिंदुस्तान में कुछ ज्यादा ही है. इसलिए हिंदुस्तान की जनता गरीब है और उसे अपने हक का पता नहीं. धार्मिक और आध्यात्मिक होना क्या होता है ? हिंदू या मुसलमान होना धार्मिक और आध्यात्मिक होना नहीं है. स्वंय को देख लेना आध्यात्मिक होना है. धार्मिक वो होता है जिसने स्वंय को पहचान लिया. बुद्ध ने किसे देखा…स्वंय को या तुम जैसों के तथाकथित ईश्वरों को…महावीर ने किसे देखा…उनकी घोषणा देखी. अप्पा सो परमप्पा…जो आत्मा है. वही परमात्मा है. जो मैं हूं…वही परमात्मा है.

कृष्ण ने स्वंय को देख लिया

ये घोषणाएं हिंदू या मुसलमान, सिख या ईसाई बौद्ध या जैन नहीं निकाल सकता. ये लोग घोषणा नहीं कर सकते हैं. लेकिन जिसने स्वंय को देख लिया…कृष्ण ने स्वंय को देख लिया. वो अर्जुन को कहता है छोड़ छाड़ सबकुछ..और मेरी बात सुन. मेरे पीछे आ…ये घोषणाएं वही कर सकता है जिसने स्वंय को देख लिया. और अध्यात्मिकता का अर्थ ही इतना है कि तुम स्वंय को देख लो. जिस दिन तुम स्वंय को देख लोगों. उस दिन सुख ही सुख हो. क्योंकि तुम हीं तो वो हो जिससे मिलने नदियां भागतीं हैं. जिससे मिलने के लिए अग्नि आसमान की तरफ उठती है. जिससे मिलने के लिए हवाएं चलतीं हैं.

हिंदू या मुस्लिम होना आवश्यक नहीं (धार्मिक और आध्यात्मिक)

लेकिन अभी तक तुमने स्वंय को नहीं देखा. इसलिए प्रश्न कर रहे हो कि क्या धार्मिक होना या अध्यात्मिक होना आवश्यक है. हिंदू या मुस्लिम होना आवश्यक नहीं है बल्कि अध्यात्मिक होना आवश्यक है. और अध्यात्मिक वो होता है जो स्वंय को देख लेता है. मान लो कि तुम मुसलमान हो…जिस दिन तुम स्वंय को देख लोगे…उस दिन तुम्हें खुदा ही खुदा नजर आएगा. हिंदू में भी तुम्हें खुदा नजर आएगा. उस दिन तुम्हें मंदिर में भी खुदा नजर आएगा. हर धर्म स्थल में तुम्हें खुदा नजर आएगा. और एक हिंदू…जिस दिन वह स्वंय को देख लेगा…वह कह उठेगा…वाह…ईश्वर ही ईश्वर…परमात्मा ही परमात्मा…उस दिन फिर वो मस्जिद तोड़ने के लिए नहीं जाएगा. वो मुसलमान को गाली नहीं देगा. उसे समझ आ जाएगा कि जो मैं हूं..वो ये है.
अपने जीवन को देखना है, वहीं धर्म है

एक ही ईश्वर है

उसे चाहे तुम ईश्वर कहो… परमात्मा कहो…. गॉड कहो….अल्लाह कहो…दूसरा है ही नहीं. दुकान चलाने वालों ने नाम अलग अलग दे दिये. और कुछ भी तो नहीं है यहां…अध्यात्मिक होना जरूरी है. अध्यात्मिक होना केवल इतना है कि तुम स्वंय को देख लो. और जिस दिन तुम स्वंय को देख लोगे. उस दिन पता चलेगा कि जिसे तुम खोज रहे थे वो तुम्हीं हो. लेकिन देह को देखोगे तो कुछ भी समझ नहीं आएगा. जो देखने वाला है उसे देखो. जो खोजने वाला है उसे देखना है. जो जीने वाला है उसे देखना है. अपने जीवन को देखना है. वहीं धर्म है. वहीं अध्यात्म है.

खुदा बहुत सुंदर है

जिस दिन तुम खुद को देख लोगे. उस दिन ना तो तुम मूढ़ों की तरह हिंदू की कतार में लगोगे और ना ही मुस्लिम की पंक्ति में लगोगे. ना पुलिसवालों को पत्थर मारोगे. ना कोई मंदिर तोड़ेगा. ना कोई मस्जिद तोड़गा. ना कोई चर्च तोड़ेगा. ना कोई कन्वर्ट करेगा. कोई कुछ नहीं करेगा. खुदा बहुत सुंदर है. उसने इतना सुंदर जीवन दिया है. मैं भी जियूं और ये भी जिए. और करना ही क्या है. मैं तुम्हें कन्वर्ट नहीं कर रहा हूं. मैं तुम्हें स्वंय के दर्शन करा रहा हूं. तुम इधर उधर भाग रहे हो. लेकिन मैं कहता हूं कि खुद को देखो. वहां केंद्रित हो जाओ. जिस दिन तुम एक जगह केंद्रीत हो जाओगे. उस दिन बोलोगे कि बहुत आनंद आ रहा है.

इतना सुंदर जीवन मिला है और हम कल्पनाएं करके बैठे हैं कि यहां जप तप करेंगे तो वहां स्वर्ग मिलेगा. यहां लोगों की हत्या करेंगे तो वहां 72 हूर जन्न्त में मिलेंगी. किन मूढ़ताओं में फंस गये हो तुम…स्वंय के दर्शन करने थे.

आज केवल इतना ही…शेष किसी और दिन…अंत में चारों तरफ बिखरे फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…