Holy Book of Hindus :कौन सा है हिंदुओ का धर्म ग्रंथ

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holy book of Hindus

एक व्यक्ति पूछता है कि परमात्मा तुम क्या सिखाने का प्रयास करते हो. तुम क्या समझाना चाह रहे हो या तुम दुनिया को क्या बनाना चाह रहे हो. मैं दुनिया को स्वर्ग बनाने का प्रयास कर रहा हूं ताकि तुम जियो यहां पर…ताकि तुम स्वर्ग में आनंदित होकर रहो और उत्सव मनाओ. लेकिन तुम और तुम्हारे धर्म गुरु (Holy Book of Hindus)…तुम्हारे धर्म शास्त्र…वो क्या करना चाह रहे हैं. वो बलि देना चाह रहे हैं तुम सबकी. अपने अपने धर्मों की वेदी में और मैं तुम्हें वहां से मुक्त करना चाह रहा हूं.

अनमोल हो तुम (Holy Book of Hindus)

इंसान के जीवन की कीमत क्या आंकी है तुमने…क्या सिर पर तिलक और जाली टोपी. या पगड़ी या क्रॉस…बस इतनी सी कीमत है जीवन की. तुम्हारा जीवन अनमोल है. मैं तुम्हें तुम्हारी कीमत दिखा रहा हूं कि अनमोल हो तुम…परमात्मा हो… तुम्हारा जीवन एक पुष्प की तरह है जिससे सुगंध निकलती है. लेकिन तुम लगे हुए हो धर्मों की भेड़ बनने की होड़ में. ज्ञान पुस्तकों से नहीं मिलता है. मुझे तो नहीं मिला था. अगर तुम्हें मिल गया है तो बहुत अच्छा है. मुझे भी सुनना बंद करो और अपने अपने धर्म स्थलों में जाना भी बंद करो. अपने अपने धर्म शास्त्रों को भी बंद करो क्योंकि तुम्हें तो ज्ञान मिल गया और सत्य का बोध हो गया.

अहं ब्रह्मास्मि का ज्ञान

क्या दर्पण में स्वंय को देखकर कह पाओगे कि तुम्हें ज्ञान मिल गया. अहं ब्रह्मास्मि का ज्ञान है, जो हिंदू को सड़क पर माइक लेकर बोलने का नहीं है. बस पता चल गया कि तुम ही ब्रह्म हो…कहानी खत्म हो गयी. तुम्हें पता चल गया कि तुम्हीं ब्रह्म हो..तुम ही वो सागर हो जिससे मिलने के लिए नदियां भागती है. तुम्ही वो हो जिसकी मृत्यु कभी नहीं होती है. तुम्हीं वो हो जिसके जगने से सारा जहां जगता है. यह अनुभव का विषय है. धर्म किताबों का विषय नहीं होता है. जिसको अनुभव हो गया वो आनंद से जीता है और जिसको अनुभव नहीं हुआ वो सिर फोड़कर जीता है.

परमात्मा का अनुभव करना है

जिसको अनुभव हो गया वो जहां भी बैठता है, कहता है कि आनंद ही आनंद है. उसे अब कहीं नहीं जाना होता है, ना तो स्वर्ग और ना ही बैकुंठ, ना ही जन्नत…फिर स्वंय उद्घोष निकला है अहं ब्रह्मास्मि…दूसरो को सुनाने के लिए नहीं..बल्कि खुद के लिए. अहं ब्रह्मास्मि का जाप तीर्थ स्थलों में जपे जा रहे हैं लोग…अरे जब ब्रह्म बन ही गया तो अब क्यों जपे जा रहे हो. यानी नहीं मिला. यानी अनुभव नहीं हुआ. यानी जपने से अनुभव नहीं होता. होता तो तुम्हें अबतक हो गया होता. कोई दासोहम, कोई अहं ब्रह्मास्मि तो कोई नमाज पढ़ रहा है. जब अनुभव हो गया कि जर्रे जर्रे में तेरा ही नूर है तो अब काहे की नमाज…खुदा ही खुदा है हर जगह…लेकिन अभी तक अनुभव नहीं हुआ. यही तो मैं तुम्हें कह रहा हूं कि अनुभव करना है. अनुभव होते ही चारों दिशाओं में फूल खिल जाएंगे.

दुखालयम…तुम्हारे शास्त्रों में ही तो लिखा है

वो फिल्मों में तुमने देखा है ना…जब लड़का को लड़की से प्यार होता है तो…जब लड़की सामने आती है तो चारों ओर वायलिन बजने लगता है. प्रकृति नाचने लगती है. ये तुम्हें नहीं दिखेगा. ये उन दोनों को ही अनुभव होगा. इसलिए मैं कह रहा हूं कि प्रकृति जागृत उसी को दिखती है जिसका बोध जाग जाता है जिसको ज्ञान प्राप्त हो जाता है. लेकिन तुमको तो कुछ भी नहीं हुआ.

यहां तो दुख ही दुख है. बुद्ध या प्रज्ञावान कहता है कि यहां तो सुख ही सुख है. आनंद की वर्षा हो रही है. लेकिन तुम्हारे शास्त्रों में ही तो लिखा है कि यहां दुख ही दुख है. दुखालयम…तुम्हारे शास्त्रों में ही तो लिखा है. लेकिन मैं तो कहता हूं कि यहां कोई दुख है ही नहीं…सुख ही सुख है. आनंद की वर्षा हो रही है. मैं तुम्हें वही अनुभव करवा रहा हूं. यदि वो हो गया तो तुम भी मस्त हो जाओगे. नहीं होगा तो जपते रहोगे सारा जीवन…

अपना जीवन जियो (Holy Book of Hindus)

मैं यही तो समझा रहा हूं कि मूर्खता की दौड़ में मत जियो…इनसे बाहर निकलो और अपना जीवन जियो. तुम्हारे धर्मों ने मनुष्य की कीमत दो कौड़ी की आंकी है. मैं जीवन को अमूल्य मानता हूं. हर किसी के जीवन की कीमत अनमोल है, चाहे वो मनुष्य हो, पशु हो, पक्षी हो पेड़ हो. हो सकता है तुम्हें ये अनुभव हो. लेकिन यदि तुम स्वार्थ भाव से आओगे तो तुम्हें ये अनुभव कभी नहीं होगा. धर्म से तुम अर्थ की चाह रखोगे तो तुम्हें अनुभव कभी नहीं होगा. पंडितों को परमात्मा का अनुभव पूरा जीवन नहीं होता है. वह एक ऐसा प्राणी है जिसे आज तक परमात्मा का अनुभव नहीं हुआ. वो मूर्ति को ही ईश्वर समझता आया है.

मूर्ति किसी की भी बना लो. कागज की, पत्थर की, पीलत की…क्या परमात्मा या खुदा जड़ है… नहीं…चेतन का अनुभव करना था. और वो चेतन तुम हो. जीवित का अनुभव करना था. वो जीवन हो तुम…मैं इसी पर काम कर रहा हूं कि तुम्हारे जीवन का दर्श तुम्हें करवा दूं.

आज केवल इतना ही…शेष किसी और दिन…अंत में चारों तरफ बिखरे फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…